शंकर सिंह भाटिया
यूकेडी में आए जुम्मा साल भर नहीं हुआ, कार्यकारिणी भंग करने और दल के विभाजन का दावा करने लगते हैं कई नेता। अनुशासन से लेकर तमाम मुद्दों पर भाजपा-कांग्रेस से भी नेता निकाले जाते हैं, लेकिन वे ऐसा दावा करने की हिमाकत नहीं कर पाते। इसके लिए यूकेडी का दलगत ढांचा जिम्मेदार है? बार-बार विभाजित होते रहने की इस दल की परंपरा जिम्मेदार है? यूकेडी नेताओं की सत्तालोेेलुपता जिम्मेदार है? यूकेडी संस्थापक प्रो.डीडी पंत के सिद्धांतों को दरकिनार कर कभी भाजपा कभी कांग्रेस के साथ सत्ता की जूठन चाटने की लालसा राज्य की लड़ाई लड़ने वाले दल को यहां तक ले आई है?
सन् 1994 का उत्तराखंड आंदोलन एक मिसाल है। यह सच है कि उत्तराखंड राज्य की लड़ाई यहां के जन-जन ने लड़ी, लेकिन इस लड़ाई का नेतृत्व यूकेडी ने किया। इतना गौरवान्वित करने वाला इतिहास रखने के बावजूद राज्य गठन के बाद यूकेडी नेतृत्व की अपरिपक्वता, इस क्षेत्रीय दल को चुनावी बुलंदियों तक नहीं पहुंचा पाई। आंदोलन के उस दौर में जब इंद्रमणि बडोनी का बेदाग और निर्विवादित नेतृत्व दल को मिल रहा था, यूकेडी उस दौर में भी चार बार टूटती रही। लेकिन उस दौर में दल तोड़ने वाले बार-बार यह काम करते फिर दल में वापस लौट आते। सत्ता का लालच उन्हें दल से दूर लेकर जाता, लेकिन यूकेडी के प्रति लगाव फिर वापस ले आता। लेकिन आज के दौर में जो यूकेडी में आकर अपनी मनमानी करते हैं और बाहर किए जाने पर दल को तार-तार करने में जुट जाते हैं, उनका इस क्षेत्रीय सोच से कोई लेना-देना नहीं होता है। ये केवल किसी न किसी के हाथ में खेल रहे होते हैं, जो यूकेडी को जड़ से उखाड़ फैंकना चाहते हैं।
पिछले कुछ सालों में बहुत सारे लोग यूकेडी से जुड़े, दल के अनुशासन में रहने के बजाय, मनमानी की, फिर छिटकते रहे। दल से बाहर जाते हुए अधिकांश यही प्रदर्शन करते रहे कि वे इस क्षेत्रीय दल के सबसे बड़े हिमायती थे, उन्हें दल से बाहर कर बहुत बड़ा कुठाराघात दल पर किया गया है। इस दौरान हंगामे भी होते रहे। इस दौरान उनकी तरफ से दल की जड़ें खोदने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई। दल को तार-तार करने की इस प्रक्रिया में दूसरे राजनिक दलों और राज्य के बाहर से उत्तराखंड आकर धन के बल पर दलाली और राजनीति का घालमेल करने वाले यूकेडी को तोड़ने और दल की फूट को सतह पर लाने के हर मौके को भुनाते रहे।
यूकेडी का मजबूत होना बहुत सारे नेताओं और दलों को नहीं भाता है। क्योंकि यदि यूकेडी मजबूत हुई तो उत्तराखंड के जमीनी सवाल, बहुत सारे असल मुद्दे सतह पर आएंगे, जिन्हें भाजपा-कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों ने सत्ता के बल पर जमीन के नीचे दफना दिया है। अपना ऐजेंडा लेकर वे यहां सुविधाजनक तरीके से राज करते रहे हैं। यूकेडी के मजबूत होने पर फिर से पहाड़ के मुद्दे पुनर्जिवित हो उठेंगे। जो उन्हें चुभते हैं, असुविधाजनक लगते हैं, उनके निर्णयों और कामों पर सवाल उठाते हैं। अंततः उन्हें असहज करते हैं। इसीलिए यूकेडी को वे दफना देना चाहते हैं, जिसमें उन्हें अभी तक काफी हद तक सफलता भी मिली है। यदि उत्तराखंड के लोग जाग गए खासकर युवा इस असलियत को समझ गए तो दिल्ली से संचालित होने वाले सत्ताधीशों के लिए यहां सत्ता हासिल करना असंभव हो जाएगा। बहुत सारे दलाल नेताओं की भी इससे कलई खुल जाएगी। स्वाभाविक है उन्हें ऐसे जनता के सवाल कुरेदने वाले लोग नहीं चाहिए।
याद कीजिए 1990 के दशक का वह दौर जब उत्तराखंड में एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस के सामने यूकेडी सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हो गई। इस दौर में उत्तराखंड में भाजपा का कोई नामलेवा तक नहीं था। 1991 के राम मंदिर आंदोलन के दम पर भाजपा ने यूकेडी का पूरा जनाधार हड़प लिया। उक्रांद नेताओं की अपरिपक्व राजनीति की वजह से भाजपा मजमा लूट ले गई, दल के कर्ताधर्ता यह सब देखते रह गए। हालांकि इस बीच 1994 का ऐतिहासिक उत्तराखंड आंदोलन हुआ, जिसका यूकेडी निर्विवादित तौर पर नेतृत्व करता रहा, इस आंदोलन का लाभ भी यूकेडी नेता नहीं अर्जित कर पाए।
इसके बावजूद उत्तराखंड राज्य गठन के बाद हुए पहले चुनाव में राज्य की जनता ने यूकेडी को चार सीटें दी। यदि यूकेडी नेतृत्व परिपक्व होता तो चार सीटों के बल पर सड़क के संघर्ष को सदन पर लाकर सत्ता की चूलें हिलाकर रख देता। जिन मांगों के लिए राज्य का गठन हुआ था, सत्ता में चाहे कांग्रेस रही हो या फिर भाजपा, उन्हें हमेशा दरकिनार किया जाता रहा। इसी मौके पर क्षेत्रीय दल को अपने विरोध को जनता के बीच लेकर जाना चाहिए था। लेकिन यूकेडी के चार विधायकों ने जनता का संघर्ष छोड़कर शातिर राजनीतिज्ञ नारायण दत्त तिवारी की प्रदक्षिणा करने का प्रण ले लिया। उत्तराखंड विरोधी नारायण दत्त तिवारी पांच सालों तक अपने मनमाने निर्णय उत्तराखंड पर थोपते रहे, उत्तराखंड की भावनाओं से खेलते रहे, यूकेडी नेताओं को विधानसभा उपाध्यक्ष का पद देने का झांसा देकर टहलाते रहे, उनकी छोटी-छोटी मांगों को पूरा कर उन्हें मीठी गोली देते रहे। इसी मृग तृष्णा में यूकेडी नेता अपना उद्देश्य भूल गए, उत्तराखंड की लड़ाई भूल गए।
अगली बार 2007 के चुनाव में यूकेडी विधायकों की संख्या घटकर तीन रह गई। यह यूकेडी को जनता की चेतावनी थी। इसे दरकिनार कर यूकेडी नेताओं ने नौ बिंदुओं का बहाना बनाकर भाजपा के साथ सत्ता की जूझन चाटने का आत्मघाती निर्णय ले लिया। 2012 के चुनाव में यूकेेडी को सिर्फ एक सीट मिली, वह कांग्रेस का पत्तल चाटने निकल पड़े। इसके बाद 2017 और 2022 में दो विधानसभा चुनाव और हो चुके हैं। अब यूकेडी का प्रतिनिधित्व शून्य है। यही नहीं यूकेडी का वोट प्रतिशत भी इस दौरान लगातार नीचे गिरता जा रहा है।
उत्तराखंड राज्य के गठन के 25 साल पूरे होने के बाद आने वाले 2027 के चुनावों से पहले यूकेडी के दिन फिरने की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। युवाओं का यूकेडी के प्रति बढ़ते लगाव के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। कुछ सर्वेक्षणों में भी यह बात सामने आ रही है कि यूकेडी सीट चाहे जितने भी जीते, यदि सही रणनीति के साथ चुनाव लड़ा गया तो मत प्रतिशत में काफी इजाफा हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो यह यूकेडी को पुनर्स्थापित करने में मील का पत्थर साबित होगा। इससे पिछले डेढ़ दशक से अपनी मान्यता के लिए संघर्ष कर रहे क्षेत्रीय दल को मान्यता प्राप्त दल के रूप में पहचान मिल सकती है। भाजपा-कांग्रेस के पहाड़ विरोधी कामों को उजागर कर, उन्हें भुनाने की जितनी संभावनाएं इस समय यूकेडी के हाथ लगी है, उसका एक हिस्सा भी यूकेडी नेता चुनाव में भुना पाएंगे? यदि ऐसा हुआ तो यूकेडी का वह 1990 के दशक वाला स्वर्णकाल वापस लौट सकता है। इसके लिए पुराने नेताओं को साथ खड़े रहना होगा, लेकिन परिवर्तन की राह में युवा पहली पंक्ति में खड़े रहें।
इस चुनाव में यदि कुछ हांसिल करना है तो सबसे पहले यूकेडी के नेताओं को अपने स्वार्थ खूंटी पर टांगकर मैदान में उतरना होगा। इतना ही नहीं यूकेडी को पहले भाजपा फिर कांग्रेस की सरकार में शामिल होने के लिए उत्तराखंड की जनता से माफी मांगनी होगी। जनता से वायदा करना होगा कि यदि यूकेडी के विधायक जीतकर आते हैं तो दल भाजपा या कांग्रेस किसी का भी समर्थन कर सरकार में शामिल नहीं होगा। विपक्ष में रहकर सत्तासीनों को पहाड़ की हकीकत दिखाता रहेगा, पहाड़ के अधिकारों को बहाल करने के लिए निरंतर संघर्ष करते रहेंगे। इतना होकर भी यूकेडी नेता सत्ता की कुर्सी पर लार टपकाते रहे, किसी भी तरह सत्ता से चिपके रहने की अपनी पुरानी आदतों से बाज नहीं आए तो उनके दिन बहुरने वाले नहीं हैं। सत्ता के पास तभी जाना है, जब अपने दम पर सत्ता हासिल कर सकेंगे, इसे केवल संघर्ष से ही हासिल किया जा सकता है। भाजपा-कांग्रेस की जूझन चाटकर नहीं।





