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Uttarakhand News

बजट 2025: एमएसएमई के लिए जलवायु वित्त को मजबूत करने की दिशा में कदम

February 24, 2025 5:34 pm
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5 Min Read
जलवायु परिवर्तन
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लेखिका:
नमिता विकास, संस्थापक और प्रबंध निदेशक, ऑक्टस ईएसजी
स्वप्ना पाटिल, प्रबंधक, इंडिया, एसएमई क्लाइमेट हब

एमएसएमई: अर्थव्यवस्था की रीढ़ और जलवायु परिवर्तन की चुनौती
छोटे और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी होते हैं। भारत में इनका योगदान जीडीपी का 30% है। 2025-26 के केंद्रीय बजट में एमएसएमई को बढ़ावा देने के लिए निवेश और टर्नओवर की सीमाएं बढ़ाई गई हैं। इससे उन्हें स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े नए क्षेत्रों में अवसर मिल सकते हैं। लेकिन भारत की हरित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए सिर्फ बजट प्रावधान काफी नहीं हैं। इसके लिए वित्तीय तंत्र को और सशक्त बनाने और नीतिगत सहयोग को बढ़ाने की जरूरत है।

एमएसएमई का विस्तार पर्यावरण को प्रभावित करता है। उभरते बाजारों में कुल प्रदूषण के 40% उत्सर्जन के लिए छोटे और मध्यम उद्योग जिम्मेदार हैं। इसलिए नेट-जीरो लक्ष्य पाने के लिए इनकी भूमिका अहम हो जाती है। लेकिन ये उद्योग जागरूकता की कमी, हरित वित्त तक सीमित पहुंच और सतत विकास के फायदों को न समझ पाने की वजह से पिछड़ जाते हैं।

बजट 2025: एमएसएमई के लिए महत्वपूर्ण घोषणाएं
बजट में एमएसएमई को उनके विशेष दर्जे को बनाए रखते हुए विस्तार करने की अनुमति दी गई है। साथ ही,

गारंटी कवर बढ़ाया गया है, जिससे कर्ज देने वालों का जोखिम कम होगा।
ऋण प्रक्रिया को सरल किया गया है, जिससे छोटे व्यवसायों को आसानी से वित्तीय मदद मिलेगी।
महिला उद्यमियों और अनुसूचित जाति/जनजाति के उद्यमियों के लिए टर्म-लोन उपलब्ध कराया जाएगा।
एमएसएमई के लिए क्रेडिट कार्ड की सुविधा दी गई है, जिससे वित्तीय जरूरतें पूरी हो सकेंगी।
इसके अलावा, नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन, नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन और न्यूक्लियर एनर्जी मिशन के जरिए एमएसएमई को स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में नए अवसर मिलेंगे। हालांकि, बजट में वित्तीय संस्थानों को हरित विकास से जोड़ने पर ज्यादा जोर नहीं दिया गया है, जबकि यह बेहद जरूरी है।

एमएसएमई के लिए मौजूदा जलवायु वित्त परिदृश्य
एमएसएमई को जलवायु वित्त उपलब्ध कराने के लिए कई योजनाएं शुरू की गई हैं।

सिडबी (SIDBI) ने वर्ल्ड बैंक के साथ मिलकर ऊर्जा दक्षता परियोजनाओं के लिए जोखिम साझाकरण सुविधा शुरू की थी, जिससे 2022 तक 205 गीगावाट ऊर्जा की बचत हुई और 1.52 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन घटा।
सिडबी ने एमएसई-GIFT योजना शुरू की है, जो कम ब्याज दरों पर हरित प्रौद्योगिकी को अपनाने में मदद करती है।
टाटा पावर के साथ साझेदारी के तहत एमएसएमई को रूफटॉप सौर ऊर्जा प्रतिष्ठानों के लिए बिना गारंटी के कर्ज दिया जा रहा है।
हालांकि, भारत में केवल 14% एमएसएमई को ही औपचारिक वित्तीय मदद मिलती है और उनमें से भी बहुत कम को जलवायु वित्त का लाभ मिलता है। नेट-जीरो लक्ष्य पाने के लिए बड़ी मात्रा में जलवायु वित्त की जरूरत होगी।

एमएसएमई को जलवायु वित्त तक पहुंचने में चुनौतियां
एमएसएमई के सतत विकास में कई बाधाएं हैं:

हरित निवेश से मुनाफा आने में समय लगता है।
निवेशकों को आकर्षित करने के लिए पर्यावरणीय प्रभाव को मापना कठिन होता है।
पूंजी बाजार तक सीमित पहुंच और उच्च ब्याज दरें वित्तीय बोझ बढ़ाती हैं।
छोटे उद्योगों के पास अपनी सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग के लिए पर्याप्त डेटा नहीं होता।
बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग (BRSR) की अनिवार्यता न होने के कारण अधिकतर एमएसएमई को अपने गैर-वित्तीय प्रदर्शन की रिपोर्ट नहीं करनी पड़ती। इससे वित्तीय संस्थानों के लिए उनका हरित मूल्यांकन करना मुश्किल हो जाता है।

आगे की राह: क्या किया जाना चाहिए?
सरकार को एमएसएमई के लिए एक मजबूत जलवायु वित्त तंत्र बनाना होगा, जिसमें:

कम जोखिम वाले वित्तीय मॉडल और कम ब्याज दरों पर हरित ऋण शामिल हों।
बड़े उद्योगों की तरह एमएसएमई के लिए भी ग्रीन रिपोर्टिंग अनिवार्य की जाए, ताकि पारदर्शिता बढ़े और निवेशकों का भरोसा बढ़े।
अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप एमएसएमई को कार्बन उत्सर्जन रिपोर्टिंग में सक्षम बनाया जाए।
जलवायु वित्त से जुड़ी जानकारी और प्रशिक्षण कार्यक्रम भी जरूरी हैं, ताकि एमएसएमई सतत विकास के लिए सही कदम उठा सकें।

निष्कर्ष
भारत को जलवायु वित्त और नीति समर्थन के जरिए एमएसएमई को हरित बदलाव के लिए सक्षम बनाना होगा। सही सहयोग मिलने पर ये छोटे उद्योग देश के नेट-जीरो लक्ष्य को हासिल करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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